जब डर पुरुषों का हो, तो पहरे लड़कियों पर क्यों?


कल्पना कीजिए, कुछ लड़के शाम के समय बाहर जाना चाहते हैं।

कोई उनसे कहता है,

“नहीं, अभी नहीं, सात बज चुके हैं, घर पर रहो।”

स्वाभाविक रूप से वे पूछ सकते हैं,

“क्यों? सात बजे बाहर जाने में क्या गलत है? हम बस थोड़ा घूमना चाहते हैं, दोस्तों से मिलना चाहते हैं या कुछ देर साथ समय बिताना चाहते हैं।”

और सच कहें तो उनकी यह नाराज़गी समझ में आती है।

लेकिन अब जरा किसी दूसरी चीज़ के बारे में सोचिए।

कितनी लड़कियाँ बचपन से ठीक यही बातें सुनती हुई बड़ी होती हैं?

“शाम में बाहर मत जाना।”

“अंधेरा होने से पहले घर आ जाना।”

“बहुत देर तक बाहर मत रहना।”

“वहाँ अकेले मत जाना।”

“किसी को अपने साथ ले जाना।”

क्यों?

क्योंकि समाज में कुछ लड़के और कुछ पुरुष ऐसी घिनौनी हरकतें करते हैं। वे महिलाओं को परेशान करते हैं, उनका पीछा करते हैं, उन्हें धमकाते हैं, उनका यौन उत्पीड़न करते हैं और कुछ तो उनके साथ बलात्कार तक करते हैं।

यह एक कड़वी सच्चाई है। हम यह दिखावा नहीं कर सकते कि ऐसा होता ही नहीं है।

और इसी वास्तविकता के कारण परिवार डरने लगते हैं। माता-पिता अपनी बेटियों को लेकर चिंतित रहते हैं। लड़कियाँ सीख जाती हैं कि उन्हें कहाँ जाना है, कब जाना है, कैसे यात्रा करनी है और आसपास कौन हो सकता है इन सबका ध्यान रखना जरूरी है।

लेकिन मुझे एक बात परेशान करती है।

कुछ पुरुषों के गलत व्यवहार की कीमत हर लड़की की आज़ादी क्यों चुकाए?

उसे घर में इसलिए क्यों रहना पड़े क्योंकि कोई दूसरा व्यक्ति खुद पर नियंत्रण नहीं रख सकता?

समाधान अक्सर यह क्यों होता है कि,

“लड़कियों को बाहर नहीं जाना चाहिए,”

बजाय इसके कि,

“पुरुषों को महिलाओं को परेशान, प्रताड़ित या नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए”?

अब इसे एक दूसरी दिशा से सोचिए।

अगर हर लड़के और हर पुरुष को भी इसी तरह की पाबंदियों का सामना करना पड़े तो?

मान लीजिए शाम के सात बजे के बाद लड़कों से कहा जाए,

“बाहर रहने की तुम्हारी कोई जरूरी वजह नहीं है। घर पर रहो।”

किसी लड़के को सच में कोई जरूरी काम है? ठीक है, उसे जाने दीजिए।

लेकिन अगर पाँच दूसरे लड़के सिर्फ घूमने, दोस्तों के साथ समय बिताने या यूँ ही बाहर रहने के लिए जाना चाहते हैं, तो उन्हें घर पर रहना होगा।

न सड़क पर घूमना।

न दोस्तों के साथ बाहर खड़े होकर बातें करना।

न शाम को यूँ ही घूमने निकलना।

न अपनी मर्जी से कहीं भी चले जाने की आज़ादी।

उन्हें घर में बैठना होगा और उस बेचैनी को महसूस करना होगा।

और जब वे घर में बैठकर सोचेंगे,

“मैं बाहर क्यों नहीं जा सकता? किसी दूसरे व्यक्ति के गलत काम की वजह से मेरी आज़ादी क्यों छीनी जा रही है?”

तब शायद वे समझ पाएँगे।

क्योंकि यही सवाल लड़कियाँ वर्षों से जीती आ रही हैं।

एक लड़की शाम सात बजे बाहर जाना चाहती है।

वह अपनी दोस्तों से मिलना चाहती है, दुकान से कुछ सामान खरीदना चाहती है, थोड़ी देर टहलना चाहती है, ताज़ी हवा लेना चाहती है या बस यूँ ही बाहर घूमना चाहती है क्योंकि उसके पास करने के लिए कुछ और नहीं है।

लेकिन फिर उसके मन में सवाल आते हैं—

अगर कोई मेरा पीछा करने लगा तो?

अगर कुछ लड़के मुझे परेशान करने लगे तो?

अगर किसी ने मुझे गलत तरीके से छुआ तो?

अगर बात इससे भी आगे बढ़ गई तो?

अगर मेरा यौन उत्पीड़न हुआ तो?

अगर मेरे साथ बलात्कार हुआ तो?

और कई बार उसके परिवार के मन में भी यही सारे डर होते हैं।

इसलिए वे कहते हैं,

“घर पर रहो।”

और बस, उसी पल उसकी आज़ादी खत्म हो जाती है।

इसलिए नहीं कि उसने कुछ गलत किया है।

इसलिए नहीं कि वह खतरनाक है।

इसलिए नहीं कि उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

उसकी आज़ादी इसलिए सीमित कर दी जाती है क्योंकि समाज में मौजूद कुछ पुरुषों पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

और यहीं लड़कों और पुरुषों को खुद से एक असहज सवाल पूछना चाहिए

अगर किसी दूसरे व्यक्ति के गलत व्यवहार को आधार बनाकर आपकी आज़ादी छीन ली जाए, तो आपको कैसा लगेगा?

क्योंकि लड़कियों के साथ यही होता है।

और अगर हम सच में चाहते हैं कि लड़के इसे समझें, तो शायद एक बार उन्हें भी वही बेचैनी महसूस करने दी जानी चाहिए।

उन्हें यह महसूस करने दीजिए कि बाहर जाने का मन हो और कोई कहे,

“नहीं। तुम बाहर नहीं जा सकते। बाहर सुरक्षित नहीं है।”

उन्हें महसूस करने दीजिए कि सड़कें बाकी सभी के लिए खुली हैं, लेकिन उनके लिए नहीं।

उन्हें समझने दीजिए कि डर के कारण जब आपकी आज़ादी नियंत्रित की जाती है, तो कैसा महसूस होता है।

और फिर उन्हें अपनी बहनों के बारे में सोचने दीजिए।

सोचिए कि उनकी बहन को कैसा लगता होगा जब उससे कहा जाता है कि वह कहीं नहीं जा सकती, देर तक बाहर नहीं रह सकती, अकेले नहीं चल सकती और वह वही आज़ादी नहीं पा सकती जो उसके भाई को मिली हुई है।

क्योंकि कभी-कभी जो लोग कहते हैं कि वे अपनी बहनों की “रक्षा” कर रहे हैं, वही अनजाने में उनकी आज़ादी भी छीन रहे होते हैं।

और यहीं पुरुष-प्रधान सोच एक तरह की “वीटो पावर” बन जाती है।

एक लड़का सिर्फ इसलिए, क्योंकि वह लड़का है, सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से यह तय करने लगता है कि उसकी बहन क्या कर सकती है और क्या नहीं।

वह बाहर जा सकता है।

वह नहीं जा सकती।

वह देर तक बाहर रह सकता है।

उसे समय पर घर लौटना होगा।

वह बिना किसी को बताए इधर-उधर घूम सकता है।

उसे बताना होगा कि वह कहाँ जा रही है और कब वापस आएगी।

उसे आज़ादी स्वाभाविक रूप से मिल जाती है।

उसे अनुमति माँगनी पड़ती है।

और कभी-कभी इसका कारण बस इतना बताया जाता है

“दुनिया लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं है।”

लेकिन दुनिया को असुरक्षित किसने बनाया?

कुछ पुरुषों ने।

कुछ लड़कों ने।

कुछ लोगों ने महिलाओं को परेशान करने, उनका उत्पीड़न करने, उन्हें डराने-धमकाने और उन्हें नुकसान पहुँचाने का फैसला किया।

और किसी तरह उनके किए की सज़ा उन महिलाओं को भुगतनी पड़ती है जिन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया।

यह व्यवस्था ही उलटी है।

समाधान यह नहीं हो सकता कि लड़कियों की ज़िंदगी को लगातार छोटा करते जाएँ, जब तक उन्हें “सुरक्षित” न मान लिया जाए।

समाधान यह होना चाहिए कि समाज को सुरक्षित बनाया जाए।

लड़कों को सिखाया जाए कि वे महिलाओं को परेशान न करें।

उन्हें सहमति और उसकी अहमियत के बारे में बताया जाए।

उन्हें समझाया जाए कि किसी महिला का शरीर और उसकी आज़ादी उनके नियंत्रण की चीज़ नहीं है।

जब कोई अपनी सीमाएँ पार करे, तो उसे जवाबदेह ठहराया जाए।

और सबसे महत्वपूर्ण महिलाओं की आज़ादी को उस समय बलिदान की चीज़ समझना बंद किया जाए, जब समाज डरने लगता है।

क्योंकि लड़कों को भी आज़ादी चाहिए।

पुरुषों को भी आज़ादी चाहिए।

लेकिन लड़कियों को भी ठीक उतनी ही आज़ादी चाहिए।

मकसद यह नहीं होना चाहिए कि लड़कों की आज़ादी छीनकर लड़कियों को आज़ादी दी जाए।

मकसद एक ऐसा समाज बनाना होना चाहिए जहाँ किसी दूसरे व्यक्ति के नुकसान पहुँचाने के डर से किसी को अपनी आज़ादी न खोनी पड़े।

शायद लड़कों को एक शाम घर में रोक देने से अपने आप कुछ नहीं बदलेगा।

लेकिन अगर उस शाम घर में बैठा एक भी लड़का अपनी बहन के बारे में सोचकर यह समझ जाए कि,

“वह हर दिन ऐसा ही महसूस करती है,”

तो कुछ तो बदला है।

शायद वह समझ पाए कि उसकी बहन कोई विशेष सुविधा नहीं माँग रही है।

वह बस वही सामान्य आज़ादी माँग रही है, जिसे उसका भाई हमेशा से अपना अधिकार समझता आया है।

वह बाहर घूमना चाहती है।

वह अपनी दोस्तों से मिलना चाहती है।

वह अपनी इच्छा से घर लौटना चाहती है।

वह हर पल इस डर का हिसाब लगाए बिना जीना चाहती है कि कहीं उसके साथ कुछ गलत न हो जाए।

क्या इतनी-सी बात माँगना भी बहुत ज्यादा है?

शायद बदलाव यहीं से शुरू होता है—किसी बड़े और चमत्कारी समाधान से नहीं, बल्कि समझ के एक छोटे-से, असहज क्षण से।

एक बेहतर समाज तब बनेगा, जब हम पुरुषों के गलत व्यवहार की वजह से महिलाओं से उनकी आज़ादी छोड़ने की उम्मीद करना बंद करेंगे।

यह तब शुरू होगा, जब पुरुष समझेंगे कि उनकी आज़ादी कभी भी उनकी बहनों की आज़ादी की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।

और यह तब शुरू होगा, जब हम महिलाओं को डर के जरिए नियंत्रित करने के बजाय, उस जिम्मेदारी को उन लोगों पर डालेंगे जो इस डर को पैदा करते हैं।

यह समझना कि अपनी आज़ादी खोने पर कैसा महसूस होता है, शायद बदलाव की दिशा में सिर्फ एक छोटा-सा कदम हो।

लेकिन बेहतर समाज की ओर बढ़ने के लिए कभी-कभी एक छोटा कदम भी बहुत मायने रखता है।

- शिवम राज कर्ण

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